Showing posts with label हाइकु. Show all posts
Showing posts with label हाइकु. Show all posts

Sunday, August 16, 2020

232:-हाइकु।

अटल थे वो
अटल ही रहेंगे
जय अटल।

सादा जीवन
सरल था स्वभाव
उच्च विचार।

नही डरते
अटल ही रहते
शत्रु काँपते।

शुरू की यात्रा
दिल्ली से लाहौर की
प्रथम यात्री।

रोड प्रोजेक्ट
जोड़ा गाँव-शहर
मुख्य उद्देश्य।

कोलकाता को
दिल्ली,चेन्नई,मुंबई
संग जोड़ा।

एक सपना
सबका हो विकास
रहे अटल।

दिया साहस
सैनिकों को बढ़ावा
जंग जिताया।

प्रथम मंत्री
दिया हिंदी व्याख्यान
गौरवान्वित।

किया उन्होंने
परमाणु परीक्षण
पोखरण में।

प्रसिद्ध कवि
ग्वालियर के लाल
ओज के कवि।

दिलाया जीत
कारगिल युद्ध में
चटाया धूल।

जहां भी रहे
किया देश का नाम
शान से रहे।

अटल नाम
अटल थे इरादे
काम अटल।

भारत रत्न
पद्म से विभूषित
थे वो अटल।

सफल नेता
पत्रकार व कवि
प्रधानमंत्री।

मृत्यु या हत्या
बिन्दु बिन्दु विचार
प्रमुख कृति।

कुशल नेता
बहुमुखी प्रतिभा
के थे वो धनी।

अविनाश सिंह
8010017450

Monday, August 3, 2020

227:-हाइकु।

दोस्ती दिवस
आता साल में एक
लगे फरेब।

मित्र बनाओ
मन से अपनाओ
साथ निभाओ।

दोस्त हो ऐसा
बिन आंख वो देखे
तुम्हारे आँसू।

मित्र हो ऐसा
न करे भेदभाव
रहे समान।

दोस्ती हो ऐसी
कृष्ण सुदामा जैसी
देखें दुनियां।

सुख या दुःख
हो आंखों के सम्मुख
सच्चा वो मित्र।

सच के साथ
आजीवन चलता
दोस्ती का रिश्ता।

पिता का हाथ
दोस्त का दिया साथ
रहे हमेशा।

धूप में छाव
मुसीबत में साथ
रहते दोस्त।

दोस्त की बात
रहे हमेशा याद
होते है खास।

जो हँसा देता
आँसू को सुखा देता
वही हैं मित्र।

लगाता गले
पढ़े दिल की बात
असली मित्र।

सच्ची मित्रता
दूर करता शूल
बिछाए फूल।

बाँट लो दुःख
खोल दो हर राज
दोस्तों के बीच।

मित्रता होती
सहारा जीवन का
भूल न यारा।

रखना तुम
पवित्रता से रिश्ता
चलेगी दोस्ती।

कैसे हो मित्र
जैसे भी रहे मित्र
मन पवित्र।

रहे जो साथ
पर्वत सा अडिग
वही है मित्र।

बीते जो पल
बचपन की याद
कैसे भुलाऊँ।

भूले न भूले
बचपन की बात
थे दोस्त साथ।

गिरने न दे
कभी झुकने न दे
वो यार दोस्त।

करो झगड़ा
हो जाना फिर साथ
यही है दोस्ती।

दोस्ती का धागा
मोतियों से पिरोना
दिखे सुंदर।

अविनाश सिंह
8010017450

Sunday, July 19, 2020

212:-हाइकु।

फूलों का हार
बदल लेता रूप
बनता फंदा।

रोई दुल्हन
विदाई के समय
कैसे हो खुश।

प्रेम का धागा
जब भी है टूटता
हो जाए छोटा।

उसका हार
करता है प्रहार
यही संहार।

दुल्हा तो हँसे
दुल्हन लगी रोने
कैसा रिवाज़।

अविनाश सिंह
8010017450

Sunday, July 12, 2020

146:-हाइकु।

श्रावण मास
रिमझिम बारिश
मनमोहक।

कोयल कुक
रंग बिरंगे खेत
आया सावन।

गरजे मेघ
कड़कती बिजली
चले पवन।

कजरी गाये
रोपे धान के खेत
मन को भाये।

चले बहार
रिमझिम फुहार
मिले ठंडक।

सजनी ओढ़े
हरी भरी चुनरी
खोजे साजन।

सुखी धरती
हुई जल से धन्य
आये सुगंध।

सावन माह
भोलेनाथ की पूजा
चढ़ाओ जल।

श्रावण बेला
रिमझिम फुहार
मेघ मल्हार।

साजन देख
सजनी इठलाई
खूब रिझाई।

भोले की भक्ति
राखी का है त्योहार
आया सावन।

पपीहा बोले
कहाँ हो रे साजन
आओ आँगन।

पुतरी पीटे
सखिया झूले झूला
गगन नीला।

हुआ सपना
कागज़ वाली नाव
फिर बनाओ।

दिखे नभ में
काले घने बादल
फिर उजाला।
 
हे भोलेनाथ
तुमसे है ये भक्ति
दो हमें शक्ति।

दुल्हन सजे
छनके पैजनिया
ओढ़े चुनरी।

अविनाश सिंह
8010017450

Thursday, July 9, 2020

126:-हाइकु।

पिता हमारे
चाँद और सितारे
लगते न्यारे।

पिता महान
है वो जीवन दान
करो सम्मान।

पिता का प्यार
न दिखता हमेशा
हो एक जैसा।

मुश्किल कार्य
हो जाते है आसान
पिता के साथ।

घर की नींव
भोजन का निवाला
रखते पिता।

पिता के रूप
अदृश्य महक सी
चारों तरफ।

पिता दुलारे
करे मार्गप्रशस्त
जीवन दान।

पिता की डाँट 
सफलता का राज
रखना ध्यान।

घर की शान
रखे सभी का ध्यान
करो सम्मान।

अविनाश सिंह
8010017450

124:-हाइकु

श्रृंगार रस
संयोग और वियोग
है दोनों अंग।

नीम के पत्ते
होते स्वयं में तीखे
गुण अनेक।

जीवन एक
पर रास्ते अनेक
चलो या रुको।

चाट के पढ़ा
अशिक्षित दीमक
सम्पूर्ण बुक।

जल की बून्द
बना देती समुंद्र
स्वयं विलुप्त।

बंगला बना
किया खुद को पैक
जाता है पार्क।

भूख के वक़्त
रोटी लगती बोटी
ठंड ना गर्म।

बेटी की डोली
औरों को लगे हल्की
पिता को भारी।

गर्भ की चीख़
सुनाई कब देती
मारे हत्यारे।

फूलों की हँसी
बादलों का गर्जन
मन मोहक।

अविनाश सिंह
8010017450


123:-हाइकु।

गुरु सम्मान
मिले स्वर्ग में स्थान
बनो महान।

जिसकी डाँट
लगती आशीर्वाद
कहते गुरु।

गुरु महिमा
दे कोयले से सोना
करो सम्मान।

राह दिखाए
अंधकार मिटाए
मान बढ़ाए।

रंक से राजा
अंधेरे से प्रकाश
गुरु बनाते।

लेना है कुछ
गुरु के आगे झुकों
विन्रम बनों।

गुरु का हाथ
कलम के समान
लिखे भविष्य।

गुरु की मार
खींचे जीवन रेखा
होता प्रसाद।

ज्ञान का बीज
कीचड़ में कमल
उगाये गुरु।

मिट्टी से घड़ा
दूधिया से भविष्य
लिख दे गुरु।

भाग्य विधाता
अंधकार मिटाता
मेरा उस्ताद।

गुरु की शिक्षा
सबसे बड़ी दीक्षा
बांध लो मुट्ठी।

मैंने जो पाया
गुरु मार्ग दिखाया
सुख ही सुख।

माँ और पिता
आरंभिक शिक्षक
अंतिम गुरु।

हुआ मैं बड़ा
पर आज भी झुकु
गुरु तो गुरु।

अविनाश सिंह
8010017450

121:-हाइकु।

पेड़ की छाया
उसके फल-फूल
होते हैं पिता।

धूप में छांंव
गागर में सागर
होते हैं पिता।

उठाये बोझ
जिम्मेदारी से दबे
होते हैं पिता।

घर की खुशी
मंदिर के देवता 
होते हैं पिता।

पिता हमारे
है चाँद और तारे
लगते न्यारे।

पिता महान
दे वो जीवन दान
करो सम्मान। 

पिता का प्यार
न दिखता हमेशा
है एक जैसा।

मुश्किल कार्य
हो जाते है आसान
पिता के साथ।

घर की नींव
भोजन का निवाला
जुटाये पिता।

पिता का रूप
अदृश्य महक सी
चारों तरफ।

पिता दुलारे
करे मार्गप्रशस्त
गुरु समान।

पिता की डाँट 
सफलता का राज
रखना ध्यान।

घर की शान
रखे सभी का ध्यान
करो सम्मान।

अविनाश सिंह
8010017450

120:-हाइकु।

हार या जीत
सिक्के के दो पहलू
ना करो भेद।

हार या जीत
होते मन के भ्रम
भरे अहम।

हार या जीत
कर्म के होते फल
कम या ज्यादा।

जीत या हार
जीवन के दो मंत्र
रहो तैयार।

हार या जीत
गाड़ी-चक्का समान
उलट फेर।

हार या जीत
सावधानी से चुनो
आगे को बढ़ो।

हार या जीत
परिवर्तन शील
नही अडिग।

हार या जीत
न मिले लगातार
करो संघर्ष।

हार या जीत
मिलेगा एक दिन
मान या ठान।

हार या जीत
दे गम या अहम
रहना दूर।

हार या जीत
देगा दुख या सुख
पहले उठ।

हार या जीत
है दीपक के रूप
देता प्रकाश।

अविनाश सिंह
8010017450

119:-क्षणिकाएंं

आँचल में छिपाई
समाज से बचाई
फिर न जाने दरिंदो
ने कैसे खोज लिया 
मिलके रेप किया।

जात मिलाया
गोत्र मिलाया
कुंडली मिलाया
फिर भी क्या भरोसा
हुआ तब भी धोखा।

दिया है दहेज
दिया है बेटी
बेच घर की खेती
हाथ जोड़े बार बार
रखना बेटी का ख्याल।

कोरोना बीमारी
बन गयी महामारी
नही कोई इलाज
करो परमाणु पे नाज
कोरोना करे विनाश।

हुआ प्रकृति का दोहन
नहीं किया तुमने सहन
प्रकृति करती कमाल
फेंका है कोरोना जाल
फस गए इसके लाल

अविनाश सिंह
8010017450

118:-हाइकु।

निभाना रिश्ते
निःस्वार्थ के भाव से
सच के साथ।

प्यारी दुल्हन
पूछे बड़े भाई से
कब है ब्याह।

नेता भाषण
होते कही कड़वे
गोली बम से।

मिटा दो नाम
करे जो बदनाम
देश महान।।

कोरोना काल
प्रकृति खुशहाल
लोग बेहाल।

गाँव की हवा
नही उसमें धुँआ
दे सुख चैन।

बेटी सा धन
फिर भी लोग बेचे
लोग खरीदे।

बाग बगीचे
हुए रंग बिरंगे
मन को भाए।

स्वर्ग नरक
जीवन के दो द्वार
स्वयं से चुनों।

वक़्त की मार
झेलते मजदूर
है बेकसूर।

अविनाश सिंह
8010017450

112:-हाइकु।

सफेद झूठ
काले सच का रंग
से रहो दूर।

डिप्रेशन हो
सबसे बात करो
यही उपाय।

पानी हो शांति 
बैठो परिवार में
करो विचार।

खुद में जीना
घुट घुट मरना
बाते करना।

समस्या बड़ी
हिम्मत नही हारो
उखाड़ फेंको।

खोज लो हल।
समस्या समाधान
दूर व्यधान।

व्यर्थ न कर
जिंदगी अनमोल
रास्ते को खोज।

जीवन त्याग
नही कोई विकल्प
बनो सबल।

हारों या जीतों
नही पड़ता फर्क
आगे को बढ़।

है घोर पाप
आत्मदाह करना
कायर होना।

करो प्रयास
मिलेगी सफलता
न हो उदास।

अविनाश सिंह
8010017450

111:-हाइकु।

जनता माँग
सरकारी आवास
बदहवास।

मोर के पंख
हर धर्म समान
तभी महान।

बढ़े या घटे
नही कोरोना डरे
लोकडॉउन।

कोरोना जंग
हारी है सरकार
व्यर्थ प्रयास।

शांत प्रकृति
दे रही है संदेश
ध्यान से देख।

कोरोना काल
हर लोग बेहाल
प्रकृति मौन।

गरीब जन
तलाशे सुखी रोटी
कच्ची न पक्की।

योद्धा सम्मान
बिकते सरेआम
खरीदे यार।

मास्क पहनो
है कोरोना इलाज
घर में रहो।

ऐसी बीमारी
बनी है महामारी
करे लाचार।

कोरोना नाम
करें चैन हराम
है गुमनाम।

चीन से आया
अजूबा वायरस
देश को खाया।

पाँव के छाले
नही दिखने वाले
खोजे निवाले।

अविनाश सिंह
8010017450

110:-हाइकु।

कृष्ण की बंसी
गोपियां मंत्रमुग्ध
नाचे ठुमुक।

राधे के कृष्ण
बजाते है बाँसुरी
मथुरा खुश।

यशोदा लल्ला
करे माखन चोरी
नंद के गाँव।

गोकुल धाम
कृष्ण का बाल्यकाल
रमण रेती।

गोपियां रूठी
बंसी के तान सुन
करे विलाप।

प्रेम का स्थल
वृंदावन नगर
मन विभोर।

कृष्ण के मित्र
सुदामा भद्र भोज
रहे अभिन्न।

ब्रज की होली
गुलाल और फूल
मन प्रफुल्ल।

मिश्री के भोग
बरसाने की राधा
दिल को भाता।

गिरिराज जी
करते परिक्रमा
मिले महिमा।

नंद के लाल
बसे मथुरा धाम
रास रचाये।

स्वर्ग नगरी
मथुरा वृंदावन
करो दर्शन।

जो नही देखा
बरसाना की होली
खाली है झोली।

असली होली
है लट्ठमार होली
मन को भाये।

जो ब्रज आये
खाली हाथ न जाए
प्रेम ले जाए।

फूलों की होली
लड्डू गोपाल संग
मन प्रसन्न।

अविनाश सिंह
8010017450

109:-हाइकु।

नाम कमाओ
स्वार्थी मत हो जाओ
मान बढ़ाओ।

हाथ की रेखा
बदलते कर्मों से
ना की तंत्रों से।

धार्मिक ग्रंथ
देते शांति की शिक्षा
न करे भ्रांति।

बेटी के रूप
दुर्गा लष्मी सम्मुख
होती है पूज्य।

गंगा का जल
करे सबको निर्मल
स्वयं दूषित।

कैद परिंदे
आजाद है मनुष्य
फिर नाख़ुश।

गिर के उठो
तेजी से आगे बढ़ो
न पीछे मुड़ो।

बेटी का जन्म
खिले बाग उद्यान
समाज दुःखी।

अविनाश सिंह
8010017450

108:-हाइकु।

दिखावे लोग
लगे मन को प्रिय
रहो सक्रिय।

बाग बगिया
बने स्विमिंग पूल
इंसानी भूल।

कोयल कूक
इंसानी करतूत
हुए विलुप्त।

वाणी के गुण
मिले धन सम्मान
रखना ध्यान।

कोख में हत्या
होता कानूनी जुर्म
नर्क में जन्म।

बेटी के काम
झाड़ू चौका बर्तन
बेटों से भेद।

होती पराई
गैरो के घर आई
लाडली बेटी।

कोमल हाथ
कालिख से है सने
फफोले पड़े।

सौदा में धोखा
बेटी के साथ खेल
जीवन हेल।

सपना टूटा
आकर ससुराल
हुई बेहाल।

अविनाश सिंह
8010017450

106:-हाइकु।

दुःखी प्रकृति
कहती हर बार
सुधर यार।

कर्म का फल
मिलेगा एक दिन
गिन न दिन।

निःस्वार्थ सेवा
मिले मन को शांति
ढोंगी से क्रांति।

अंधेरा छाया
मन में डर आया
कुछ को भाया।

बून्द बून्द से
बने नदी समुद्र
यही हैं सुख।

बेटी है धन
बेचो उसका तन
सभी है मग्न।

शादी में धर्म
बिस्तर पे कुकर्म
लोगों के कर्म।

धूप में खड़े
हवाओं से है लड़े
दे हमें छाव।

फूलों के रंग
करे मन बिरंग
ऐसे ही बन।

नन्ही सी कली
ससुराल में जली
बेसुध मिली।

स्वर्ग की खोज
करते सभी रोज
है माँ की कोख।

न होती ये माँ
न होते हम सब
न होता जग।

झूठ का घड़ा
फूटेगा एक दिन
दिन को गिन।

अविनाश सिंह
8010017450

105:-हाइकु।

द्वार मातृ के
खुले रहते रोज
लो आशीर्वाद।

माँ का उदर
गरीब या अमीर
रहता गर्म।

होंगे साकार
वो दिन के सपने
कर्म अपने।

माँ की ममता
दिव्य ज्योति के रूप
दे हमें सुख।

नव माह में
होता शिशु का जन्म
माँ क्यों दुश्मन?

माँ सूरज है
देती धूप समान
न अभिमान।

गले लगाती
गोद मे ही सुलाती
माँ कहलाती।

कन्या का दान
है सबसे महान
दहेज दान?

दुल्हन दुखी
विदाई वाले दिन
हो गमगीन।

तेरा मिलना 
दो फूल का खिलना
संग है जीना।

प्रेम का वास
चाहते हो घर में
तो रहो पास।

माँ बाप हैं
घर-घर के द्वीप
देव समीप।

स्वर्ग के द्वार
है माँ बाप के पास
रखों विश्वास।

अविनाश सिंह
8010017450

104:-हाइकु।

धरती माता
होती अन्न की दाता
क्यों बेच खाता।

कोरोना युद्ध
परमाणु है फेल
प्रकृति खेल।

सबने कहा
सब कुछ है पास
शांति विनाश।

धन की भूख
तन से मिले सुख
रहना दूर।

मन की शान्ति
खुले आसमान में
न शहर में।

ट्रैन में मौत
सब ओढ़े चादर
है बेखबर।

वर्षा का जल
दे मन को शीतल
जग निर्मल।

दुर्गा पूजते
घर में है पीटते
मर्द बनते ।

बेटी का जन्म
फैल गया सन्नाटा
चिंता सताती।

दिया है सोना
फिर भी जोड़े हाथ
बेटी का बाप।

दहेज भय
पिता को है सताए
उम्र घटाए।

बेटी का दर्द
समझती है अम्मा
वह भी बेटी।

मन मंदिर
होते है स्वच्छ द्वार
भर दो प्यार।

पैरों के छाले
किसे दिखने वाले
करें बहाने।

अविनाश सिंह
8010017450

103:-हाइकु।

राम लक्ष्मण
हिंदू मुस्लिम बने
बंधुत्व दिखे।

नारी सम्मान
होता सबसे महान
बनो इंसान।

बेटी दुलारी
घर की बने प्यारी
होती पराई।

दहेज प्रथा
हर घर की व्यथा
सहता पिता।

घर की आश
दो घर की चिराग
होती हैं बेटी।

धार्मिक दंगा
करे नेता को चंगा
हो देश नंगा।

बेटी के रूप
दुर्गा लष्मी सम्मुख
है अनुरूप।

घर की बेटी
है खजाने की पेटी
वंश है देती।

बेटी का आना
हुआ जग सुहाना
रंग उड़ाना।


अविनाश सिंह

8010017450

हाल के पोस्ट

235:-कविता

 जब भी सोया तब खोया हूं अब जग के कुछ  पाना है युही रातों को देखे जो सपने जग कर अब पूरा करना है कैसे आये नींद मुझे अबकी ऊंचे जो मेरे सभी सपने...

जरूर पढ़िए।