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Saturday, August 8, 2020

230:-पंक्ति।

 भले मैं खुद मिट जाऊंगा

पर तुम सबको बचाऊंगा

भले खुद वापस ना आऊँ

पर तुमको वापस लाऊंगा


सावन की मेंहदी  फीकी न पड़ी थी

पर जाने तुम अब कहाँ को चले गए

अभी तो नन्ही जान को  न देखा था

फिर रूठ कर इतने दूर क्यो चले गए

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

अविनाश सिंह

8010017450

Sunday, July 19, 2020

216:-पंक्ति।

न हिन्दू का भेद हुआ और न मुस्लिम को खेद हुआ
देखों आज किसी को किसी से न कोई मतभेद हुआ
सब आज देश को बचाने के खातिर बाहर आये है
तब जाकर कोरोना को खत्म करने का संकेत हुआ।

अविनाश सिंह
8010017450

215:-पंक्ति।

सामने से रहते है जो साफ
मन में ही रखते है वो पाप
सामने से जो करेगा तारीफ 
पीठ पीछे वही करेगा बुराई

अविनाश सिंह
8010017450

214:-पंक्ति।

जिन्हें हमनें अपना समझा 
वही हमारे बेगाने निकलें
जिनका हमनें सम्मान किया
उन्होंने हमारा तिरस्कार किया
हम सब कुछ बस सहते रहें
उन्हें हम अपना कहते रहें
फिर भी हमें वो नही मिले
हाथ समझ कर थामा जिनकों
वो काँटो से लिपटे निकले।
फूल समझ कर संवारा जिन्हें
शूल बन कर वह मिले हमें।

अविनाश सिंह
8010017450

213:-पँक्ति।

आज दूरी जरूर है पर प्यार अब भी वही है
मेरी मजबूरी है  वरना बात अब भी वही हैं
यू तो  मिलने  का सफर यूँही चलता  रहेगा
बस ज़ाम अलग हैं पर नशा अब भी वही हैं

अविनाश सिंह
8010017450

210:-पंक्ति।

समाज  ने नहीं दिया  हमें रोटी
फिर भी सुने हम उसकी खोटी
नही दिया हमें रहने को भी घर
फिर भी हमें कर  देता है बेघर

समाज ने नही दिया हमें जन्म
पर कर देता है ये क्रिया करम
नही दिया हमें कोई  सुख चैन
पर कर देता है जीवन  बेचैन।

अविनाश सिंह
8010017450

Friday, July 17, 2020

209:-पंक्ति।

खुदा हर समय मेहरबान हो जरूरी नही
पेड़ के हर फल मीठे हो यह जरूरी नही
तुम्हरा काम है अपने हर कर्मो को करना
खुदा उस कर्मों से खुश हो ये जरूरी नही

अविनाश सिंह
8010017450

208:-पंक्ति।

दिल से जो  निकले  बात  वो असर करती है
बिन बहर में लिखे ग़ज़ल कब बसर करती है
ये तो लेखक  के दिल और कलम की बात है
वरना मेरे लिखे बिना वो कई सवाल करती है

अविनाश सिंह
801007450

207:-पंक्ति।

खुदा अपने करम से तू  सही राह  दिखा देना
अगर भटकूँ मैं कही पे तो मेरा मार्ग बना देना
भूला देना मेरे  गलतियों को एक बच्चा समझ
शिष्य बना मुझे सच का मशाल पकड़ा  देना।

अविनाश सिंह
8010017450

Monday, July 13, 2020

202:-पंक्ति।

हर आँगन  खुशहाल  रहे  बिटियां  के आने  पे
न डूबे पिता का सर कर्ज में बिटियां के जाने पे
फिर न होगा कोई लेन देन ना होगा कोई सौदा
तब बहू बनेगी  बेटी  ससुराल  में  भी  जाने पे।

अविनाश सिंह
8001017450

201:-पंक्ति।

दुल्हन  के संग  जाने  क्यों  नर संहार  हुआ
मेहंदी वाले हाथों को कालिख़ से प्यार हुआ
मिला नही  गाड़ी  जब  दहेज  के समान  में
बेटी  पर  बैलों  जैसा  फिर अत्याचार हुआ।

अविनाश सिंह
8001017450

200:-पंक्ति।

वह सपनें भी कुछ खास होते थें
जिसमें हम और तुम पास होते थें
अक्सर पकड़ लेता मैं हाथ तुम्हारा
भले सपने दिन के ही क्यों न होते थें।

अविनाश सिंह
8010017450

199:-पंक्ति।

पढ़े लिखें शिक्षित लोग जो 
अक्सर ऑफिस लेट पहुँचते हैं 
हमेशा काम वाली बाई को समय
पर आने की उम्मीद करते हैं 
और न आने पर भला बुरा सुनाते हैं।
कड़वा तो हैं पर सत्य हैं।

अविनाश सिंह
8010017450

198:-पंक्ति।

दूर रहने पर ही अपनों की अक्सर याद आती हैं
पास होने पर कभी किसी की याद नही आती हैं
तुम तो करीब हो घर  के यह सौभाग्य हैं तुम्हारा
वरना हम जैसो को घर की याद हर वक्त सताती है

अविनाश सिंह
8010017450

197:-पंक्ति।

न रहो उदास कभी तुम मुझे फिक्र होती हैं
दुखी तुम होती और अश्रु  मेरे निकलती हैं
मैं तुम्हारे राह के कांटो को भी चुन लेता हूं
तुम रोती हो जब भी मैं उसे भी सुन लेता हूं

अविनाश सिंह
8010017450

196:-पंक्ति।

जरा सा सब्र तुम कर के तो देखों
बातों को कभी अनदेखा कर के देखों
बहुत से पत्थर दिल भी पिघल जाएंगे
और राहों के शत्रु भी कम होते जाएंगे।

अविनाश सिंह
8001017450

194:-पंक्ति।

उस बाग से आज भी चीखें मुझे सुनाई देती हैं
बेगुनाहों की लाशें आज भी मुझे दिखाई देती हैं
बस खुद को बेड़ियों में जकड़ रखा है हम सब ने
वरना बदले की भावना हर आँखों में दिखाई देती हैं

अविनाश सिंह
8010017450

193:-पंक्ति।

इंसान को इंसान से अब इंसानियत कहाँ
पनप रही है मन में देखों  हैवानियत वहाँ
क्यों लोग एक दूसरे के प्रति कट्टर हो रहे 
है हिंदुस्तानी फिर क्यों आपस में बँट रहे

अविनाश सिंह
8010017450

192:-पंक्ति।

पिताजी के सामने झुकने का मजा ही कुछ और है
जितना मैं झुकता हूँ उतना ही अधिक सीखता हूं
जो दुनिया उनके कंधों पे बैठ कर देख लिया मैंने
उसे आज देखने के खातिर मैं दर दर भटकता हूं

अविनाश सिंह
8010017450

191:-पंक्ति।

वह दोस्त है वह मित्र है
वह आत्मा है परमात्मा हैं
वह शिक्षक हैं वह ज्ञान है
हम सबमें वह महान है
वह मंदिर है वह भगवान हैं
हर देवो में वह महान है
वह पत्थर है पहाड़ है
वह अन्न है वह दान है
वह पुस्तक है वह गीता है
उसी का नाम ही पिता है।

अविनाश सिंह
801017450

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235:-कविता

 जब भी सोया तब खोया हूं अब जग के कुछ  पाना है युही रातों को देखे जो सपने जग कर अब पूरा करना है कैसे आये नींद मुझे अबकी ऊंचे जो मेरे सभी सपने...

जरूर पढ़िए।