नाम कमाओ
स्वार्थी मत हो जाओ
मान बढ़ाओ।
हाथ की रेखा
बदलते कर्मों से
ना की तंत्रों से।
धार्मिक ग्रंथ
देते शांति की शिक्षा
न करे भ्रांति।
बेटी के रूप
दुर्गा लष्मी सम्मुख
होती है पूज्य।
गंगा का जल
करे सबको निर्मल
स्वयं दूषित।
कैद परिंदे
आजाद है मनुष्य
फिर नाख़ुश।
गिर के उठो
तेजी से आगे बढ़ो
न पीछे मुड़ो।
बेटी का जन्म
खिले बाग उद्यान
समाज दुःखी।
अविनाश सिंह
8010017450
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