दुःखी प्रकृति
कहती हर बार
सुधर यार।
कर्म का फल
मिलेगा एक दिन
गिन न दिन।
निःस्वार्थ सेवा
मिले मन को शांति
ढोंगी से क्रांति।
अंधेरा छाया
मन में डर आया
कुछ को भाया।
बून्द बून्द से
बने नदी समुद्र
यही हैं सुख।
बेटी है धन
बेचो उसका तन
सभी है मग्न।
शादी में धर्म
बिस्तर पे कुकर्म
लोगों के कर्म।
धूप में खड़े
हवाओं से है लड़े
दे हमें छाव।
फूलों के रंग
करे मन बिरंग
ऐसे ही बन।
नन्ही सी कली
ससुराल में जली
बेसुध मिली।
स्वर्ग की खोज
करते सभी रोज
है माँ की कोख।
न होती ये माँ
न होते हम सब
न होता जग।
झूठ का घड़ा
फूटेगा एक दिन
दिन को गिन।
अविनाश सिंह
8010017450
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