Wednesday, October 7, 2020
234:-कविता।
Sunday, August 9, 2020
231:-घनाक्षरी।
कफम तिरंगे का जो ओढ़े,उन्हें है प्रणाम
देश के लिए ऐसी कुर्बानी होना चाहिये
करके प्रहार घात , शत्रु शीश काट कर
रणबांकुरों की ये कहानी होनी चाहिए
दुश्मनों का छीन शान,देशहित दिए जान
ऐसे वीर योद्धा को सलामी होना चाहिये
काट के गर्दन लाये,पाक को धूल चटायें
देश के लाल की ये कहानी होना चाहिये
तिरंगे मेरी शान हैं , दुश्मनों को मात कर
भगत सिंह वाली जवानी होना चाहिये
करते ना कोई पाप, रहते मन से साफ
राष्ट्र के खातिर स्वाभिमानी होना चाहिये
करें जो एकता भंग, कर दो उसका अंत
गद्दारों की ऐसी मेजबानी होना चाहिये
बढ़ाते है कदम जो ,रुकते ना वीर कभी
मन में सभी के हिंदुस्तानी होना चाहिए
दुश्मनों को चुन चुन,गोलियों से भून भून
झाँसी कीरानी जैसी मर्दानी होना चाहिये
अविनाश सिंह
Thursday, July 16, 2020
203:-आलेख।
Sunday, July 12, 2020
165:-पंक्ति।
Thursday, July 9, 2020
98:-दुःखी न हुआ करो।
88:-बदल गया हैं।
81:-टूटी साइकल।
Wednesday, July 8, 2020
54:-जीना चाहता हूं
44:-मेरा बचपन।
41:-महसूस करने लगा हूं।
कुछ अजीब सा महसूस करने लगा हूं तुम्हें पाकर,
अपने हर ग़मों से दूर करने लगा हूं तुम्हें पाकर।
न शब्द है,न लब्ज है, वो सब कुछ बोलने को,
जो पाकर तुम्हें हर पल महसूस करने लगा हूं।
बस चाहे हैं और राह नहीं कि पाकर तुम्हे खो ना दूं,
जिंदगी के हर लम्हों को मैं तेरे संग बीता सकूं।
तेरे दिल की सादगी को अपनी आंखों में उतार सकूँ,
तुझसे बिछडु ना कभी, हर दिन तुझे अपना बना सकूँ।
बस चाह है और राह नही की जिंदगी के हर मोड़ पे
हर गमो में, हर सुखो में तेरे हाथों का स्पर्श पा सकूं,।
बस चाह है और राह नहीं कि तेरी छोटी-छोटी
नादानियों को अपनी जिंदगी के खुशी बना सकूं।
हर लम्हा तेरे संग बीते, हर पल को मैं यादगार बना सकूं,
बस चाह है और राह नही की तेरी आंखों की मोहब्बत
का तकाजा अपनी गिरि नजरों से लगा सकूं।
तुझे अपना बना के बस तुझ पर ही मोहब्बत लुटा सकूँ,
बस चाह है और राह नही की गीत में जो अकेले में गाता हूं
वो तेरे संग गा सकूँ। तेरे कंधे पर सर रख आशु टपका सकूँ,
तुझसे बेइंतहा मोहब्बत करके भी तेरी मोहब्बत पा सकूँ
बस चाह है और राह नही।
अविनाश सिंह
8010017450
40:-प्यार है तुझसे।
36:-जिंदगी के ख़्वाब।
31:-जिंदगी पाना तो खोना।
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