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Thursday, July 9, 2020

90:-माँ नज़र आती है।

घड़ी  की चाल में
रोटी की  थाल में
माँ नज़र आती है

दीवारों की ईंट में
घरों   की  नींव  में 
माँ नज़र आती है

ताले की कुंजी में
चाबी के छल्ले में
माँ नज़र आती है

पूजा  की थाल में
घर  के समान  में
माँ नज़र आती है

बर्तनों  के ढेर  में
रात  के अंधेर  में
माँ नज़र आती है

चाय की प्याली में
खाने की थाली में
माँ नज़र आती  है

भोर के उजाले  में
खाने के निवाले में
माँ नज़र आती है।

खाने  के स्वाद  में
घंटी की आवाज़ में
माँ  नज़र आती है

अविनाश सिंह
8010017450

82:-डर सताने लगा।

एक डर अब सताने लगा है
उसके दूर जाने का समय अब आने लगा है
कैसे समय बीत गया मुझे अंदेशा ही न हुआ
ये सोच मेरी रातों की नींदों को उड़ाने लगा है
उसके दूर जाने का समय अब आने लगा हैं 

एक डर अब सताने लगा है
हम लड़ते थे झगड़ते थे फिर भी  साथ रहते
अपनी हर बातों को आपस में हैं साझा करते 
बचनपन से एक दूसरे का हम सहारा बनते थे
अब वह बात वह साथ टूटने सा लगने लगा है

अविनाश सिंह
8010017450

77:-ममता की छाव।

ममता की छांव है मेरी माँ,
हर दर्द की दुआ है मेरी माँ 
नन्हे कदमों से चलना सीखा,
गिरने पर उठाया जिसनें,
वह है मेरी प्यारी मां।

गलत राहों से रोका हैं जिसने
अपने खुशी को त्यागा जिसनें
सफलता को दिलाया जिसनें
वह है मेरी प्यारी मां।

गलतियों पर समझाने वाली,
सच का मार्ग दिखाने वाली, 
मुझे एक पहचान दिलाने वाली 
वह है मेरी प्यारी माँ।

मेरी खुशियों से खुशी पाने वाली, 
ठोकर लगने से मुझे बचाने वाली
अच्छे संस्कार का पाठ पढ़ाने वाली
वह है मेरी प्यारी माँ।

खुद रूखा-सूखा रोटी खाने वाली
हमें गर्म खाना को खिलाने वाली
हमें सुला कर फिर सोने वाली
वह है हमारी प्यारी माँ।
 
हमें डाँटकर भी हम गले लगाती है, 
सर्द में गर्मी का एहसास दिलाती है 
बीमार पड़ने पर सीने से लगाती है
वह है मेरी प्यारी माँ।

बचपन में हमें लोरियां सुनाती थी
बड़े छोटो का संस्कार सिखाती थी
वह भगवान की मूरत हैं मेरी माँ
वह है मेरी प्यारी माँ।

अविनाश सिंह
8010017450

Wednesday, July 8, 2020

62:-मेरी माँ।

मेरी माँ।
जल की एक-एक बूंद हैं
भरती बून्द से समुद्र है।

धरती पर सबसे पावन है
ऋतुओं में वो सावन है।

ज्ञान का वह भंडार है
विचार उसके अपार है।

मकान की वह ईंट है
रखती सबकी नींव है।

गीता की वह श्लोक है 
मेरे लिए आलोक है।

मंदिर का वह प्रसाद है
बिन माँ सब अवसाद है।

दुख में वह मेरे साथ है
देती हमें आशीर्वाद है।

संगीत की वह तान है
माँ से घर की शान है।

जल में वह अमृत है
भावों से वह निर्मित है।

खाने में वह नमक है
स्वभाव से सहज है।

गंगा सी वह कोमल है
बातों में वह निर्मल है।

खेतों की वह अनाज हैं
घर की वह साज़ है।

हां,माँ मेरी भगवान है
बिन माँ सब सुनसान है।

अविनाश सिंह
8010017450

57:-गऱीबी का आलम।

हाय गरीबी का आलम ये सब मैं क्या देख रहा,
बेटी के ब्याह खातिर बाप घर को है बेच रहा।

कहाँ नही है गरीबी कोई तो एक जगह बताओ,
जहाँ दुखे न दिल मेरा वहां मुझे तुम ले जाओ।

मंदिर में है भगवान तो बाहर गरीबो का है डेरा,
माँगते हुए भीख हुआ सुबह से रात का अंधेरा।

इस कदर गरीबी छायी हुआ देश का हाल बुरा,
कचड़े में रोटी तलाशती नवभारत का है सवेरा।

रोते बिलखते मासूम,दवा के अभाव में है मर रहे,
सियासत के नेता उसपे भी अपनी रोटी सेक रहे।

द्रवित हो उठता है मन देख भारत के भविष्य को,
किताबों की जगह कटोरे लिए देश के कनिष्क को।

कब बदलेगा समाज कब बदलेंगी गरीबी की सूरत,
थोड़ा प्रयास करो शायद बदलेगी इस देश की मूरत।

अविनाश सिंह
8010017450

46:-बेटी दुर्गा रूप

कौन कहता है बेटी दुर्गा का रूप होती है,
माँ की प्यारी और पिता की दुलारी होती है।

जो दुर्गा हुई तो इन नामर्दो के सामने आँशु क्यो बहाती है,
ससुराल के ताने-बाने सुन सब कुछ सहन क्यो कर जाती है।

लिया जन्म जो लक्ष्मीबाई का फिर पीछे हट ये जाती है,
पति के सारे हुकम को ये बर्दाश क्यो कर जाती है।

घर की लक्ष्मी होती है बस ऐसा किताबो में लिखा होता है,
ससुराल में नौकरानी बन जाती है ऐसा हाकितत में होता है।

जो पिता की दुलारी है फिर दहजे का सौदा क्यो होता है,
लेके जन्म माँ के कोख से फिर ये घर पराया क्यो होता है।

बेटे से तो कम नहीं फिर भी ये अत्याचार संग क्यो होते है,
कभी आग तो कभी जहर के निवाले ही नसीब क्यो होते है।

धरती पे लेने से पहले ही इन्हें कोख़ में मार दिया जाता है,
जन्म से पूर्व ही श्मसानघाट का रास्ता दिखा दिया जाता है।

जो इतनी प्यारी थी तो समान दर्ज क्यो नही है मिलता,
बेटों की तरह उन्हें भी वो हक क्यो नही है मिलता।

अविनाश सिंह
8010017450

42:-सम्मान अपमान।

बड़े हों इसलिए ही आपका सम्मान करती हूँ,
तभी तो मैं आपका कभी न अपमान करती हूं।

अग्नि को साक्षी मान मैंने आपको पति माना है,
माँ-बाबूजी का घर छोड़ आपको अपनाया  है।

आप मेरे रखवाले है, मेरे लिए आप ही निवाले है,
मानती हूं मैं बात आपकी,करती हूं हर काम आपकी।

सुबह से लेके शाम तक मैं सारे काम निपटाती हूँ, 
खुद भूखी होके मैं सबको पहले खाना खिलाती हूं,

कभी सास की सुनाती हूँ तो कभी ससुर की सुनती हूँ,
मैं लड़की हूँ क्या इसलिए मैं घुट-घुट के मरती हूँ।

रोटी बनाना,खाना खिलाना क्या सिर्फ यही मेरा संसार है?
अपनी इच्छाओ की हक़दार नही, सच कहने पे गुनेगार बनी।

स्वयं परिंदो समान घुमते हो, मेरे पैरों में बेड़ियो को जकड़ते हो,
पति हो क्या इसलिए, हर पल मुझमें ही कमियो को ढूंढते हो।

मेरा यही गुनाह है,आप पति हों इसलिए आप महान है,
मैं पराई बेटी हूँ ना इसलिए मुझपे ये सारे अत्याचार है।

अविनाश सिंह
8010017450

38:-मैं जा रहा हूं माँ

आज मैं जा रहा हूँ माँ,
अपनो से दूर दूसरी दुनिया में जा रहा हूँ माँ,
वहाँ अपना कोई यार नही अपना कोई प्यार नही,
आने की इतनी खुशी थी फिर जाने का इतना गम क्यो माँ।

छुट्टियां तो मानो पल भर में बीत गए,
हर एक दिन हँसी खुशी में बीत,
अब जाने का पल आ गया ना माँ,
अपनो से दूर जाने का गम सत्ता रहा है माँ।

वहाँ आपके हाथ की रोटियांको खिलाएगा माँ,
वहाँ कौन सुबह से शाम तक डाट गा माँ।,
मेरी गलतियों पे कौन समझायेगा माँ।

तेरे आँचल में वो सुख कहा से पाऊंगा माँ,
अपने लाडले बड़े भाई का प्यार कहाँ से पाऊंगा माँ,
पापा की डांट कौन सुनायेगा माँ,
अपनो सा प्यार कौन दिखाएगा माँ।

भैया दीदी का प्यार मैं कहाँ से लाऊंगा 
उनके जैसा साथी मैं वहाँ कहाँ से पाउँगा,
आपके काम मे अब हाथ कौन बटाएगा माँ,
आप मेरे बिना कैसे रह पाएंगी माँ।

आपका लाडला बेटा आज जा रहा मैं माँ,
अपने हर गमो को अपने दिल मे छुपा रहा है माँ।
घर की नन्ही सी यादे लेके जा रहा हु माँ,
इन्ही यादो के सहारे मैं अपना समय काट लूँगा माँ।

अविनाश सिंह
8010017450

30:-माँ मुझसे गलती।

मां मुझसे गलती फिर से हो गई है, 
सच को सच और झूठ को झूठ कहने की गलती अब फिर से हो गई है।

अपने से बड़ों को सम्मान देकर, 
फिर उनकी बातो से दुखी हो जाने की गलती फिर से हो गई है।

दूसरे के सपनों को पूरा कर,
स्वयं के सपनो को अधूरे में रखने की गलती अब फिर से हो गई है।

गन्दगी भरे इस समाज में स्वयं को मन से साफ रखने की गलती अब फिर से हो गई है।

गलती ना होते हुए भी नतमस्तक होने की गलती अब हो गई है।
अपने को ऊंचा मानने की गलती अब फिर से हो गई है।

अविनाश सिंह
8010017450

29:-माँ की पीड़ा।

अपने उम्र को मैने बढ़ते देखा,
माँ की उम्र को मैंने ढलते देखा।

खुद को मैंने निखरते देखा,
माँ के चहरे पे झुर्रियो को पड़ते देखा।

जब हमने जन्म लिया 
तब माँ की उम्र थी 25 साल,
हम माँ को समझ ना पाये,
आंख होते हुए भी माँ के  इस उम्र को न देख पाये।

ये जहां मेरे सोच से भी दूर था,
माँ के आंचल में ही दुनिया का सब टूर था।

चलना सिखाया था माँ ने मेरी,
अपने दिल मे मुझे सजाई थीं माँ ने मेरी।

मुझे देख हर पल वो मुस्कुराई थी,
अपने सीने से हर पल मुझे लगाई थी।

मैं 5 साल का हुआ,
माँ ने मुझे “माँ” शब्द बोलना सिखाया,
सब कुछ छोड़ मुझे सही राह पे चलना सिखाया।

माँ के आंचल में मेरा परवान चढ़ने लगा,
वक़्त के साथ-साथ कद भी मेरा बढ़ने लगा।

10 साल का हुआ मैं,
माँ के खवाइशो का दमन करने लगा,
खुद के बुने ख्वाइस में मैं सब कुछ भूलने लगा।

माँ 35 साल की हो गई,
फिर भी मैं उसे ना समझ सका,
उसकी जिम्मेदारियों को समझे बिना,
मैं उससे ही जिद्द करने लगा।

खुद की बात मानने लगा,
माँ को नीचा दिखाने लगा,
अपना हुक्म जमाने लगा,
माँ को अब मैं रुलाने लगा।

धीरे-धीरे मैं जवान होने लगा,
सारा जहा मुझपे मेहरबान होने लगा,
मैं 20 का हो गया,माँ 45 साल की हो गई,

देखते ही देखते मैं जवान हो गया
मेरे अवाज में गर्राहत आ गया,
माँ के अवाज में सन्नाहत छा गया।

मैं अब बड़ा हो गया
माँ का बुढ़ापा आ गया,
माँ 50 की हो गई,
मैं खुद सजने सवरने लगा,
माँ को मैं फिर भी ना समझा,
बात बात पे मैं उससे लड़ने लगा।

माँ बीमार पड़ने लगी
मैं खुद में बिजी रहने लगा,

माँ की बात बुरी लगने लगी,
बात-बात पे मै उसे टोकने लगा।

अब मेरी शादी हो गई,
माँ कि अब और बर्बादी हो गई,

फर्ज से मई अब और दूर होने लगा,
बिन आशीष लिए मै घर से जाने लगा
अपना कमरा मैंने अब अलग बना लिया,
माँ को बरामदे में सोने को मजबूर कर दिया।

अब माँ रातों को रोती है,
आंखों में आशु लिये वो सोती है,
अपनी धूमिल आंखों से सब कुछ देखती है,
गलती न होते हुए भी वो चुप सी हो जाती है।

आज मैं इस कदर लायक हो गया,
बीबी के बातो का मै कायल हो गया,
गहने मुझे सस्ती लगती,
माँ की दवा मुझे महंगी लगती।

उसके आभूषणो को बेच मैं पराक्रमी बन गया,
माँ को अलग कर मैं अब घर का मालिक बन गया।

भूल गया मैं वो सारा पल माँ के संग जो बीता था,
छोर गया मैं उस माँ को जिसके आँचल से मैं लिपटा था।

देख के सारा माजरा वो बस सिसकियाँ भरती थी,
कुछ न बोलते हुए बस ‘हे भगवान-2* बोला करती थी।

उनकी आँखों का भी मुझपे हुआ ना असर अब ,
देख के मुझको को हर पल वो नजरे चुराया करती थी,
मेरी गुर्रराहत के आगे वो कुछ बोल ना पाया करती थी।

धीरे-धीरे अब वो बोझ सी बन गयी,
सब कुछ होते हुए भी वो दुखी हो गयी।

घर का अब बंटवारा हो गया,
सब खुश हुए,बस माँ का दिल टूट गया।

सब कुछउसके खिलाफ होने लगा,
माँ कि जगह अब बीबी के संग फोटो लगने लगा।

इस अपमान को देख माँ सहन न कर पाई,
रोते बिलखते माँ कि अब तबियत भी बिगड़ गई।

दवा खाना छोड़ दिया,
अन्न से रिश्ता तोड़ दिया।

अब माँ बिस्तर पे लेती रहती थी,
आंख की पुतलियां बस हिला करती थी।

वक़्त चलता रहा वक़्त रुका नहीं
माँ के आँखों का आशु भी कभी सुखा नहीं।

माँ ने अब बोलना छोड़ दिया,
सबसे रिश्ता तोड़ लिया।

मैं आज भी उसपे चिल्लाने लगा,
अपना रोब उसे दिखाने लगा,
बीबी द्वारा लगाए गए लांछन उसपे लगाने लगा,

मै अब अपने में जीने लगा,
माँ के कर्तव्यों को भूलने लगा
मेरे गुस्से ने मेरे अक्ल को ख़तम कर दिया,
अब माँ न रही उसके लाश को देख मई उसे धमकाने लगा।

गुस्से में आके मैंने उसे लात मार दिया,
देखते ही देखते मैंने उसे भला बुरा कह दिया।

अब मेरा सब कुछ खत्म हो गया,
देखते ही देखते माँ का अंत हो गया।

चार लोगो से उसे कंधा दे मैंने उसे दफन कर दिया,
एक कफन देकर मैंने सारे आभूषण उसके छीन लिया।

खा गया मैं उसकी पूरी जिंदगी अपने इस कर्मो से,
बेच दिया मैंने अपने माँ को इन सारे बंधनो से।

अविनाश सिंह
8010017450

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