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Thursday, July 9, 2020

107:-परिवर्तन होना चाहिए।

यूँही कुछ मन में आज ये ख्याल आया
देख  संग्रहालय  को एक सवाल आया
क्यों न इसका रूप ही बदल दिया जाए
इसमें रखें चीजों  में ये जोड़ दिया जाए

क्या है संग्रहालय यह जानना जरूरी है
इसके मकसद को पहचानना जरूरी है
रखें जाते इसमें इतिहास के प्रमुख अंश
जो दिखाते है हमें अतीत के हमारे कर्म

कही राजा के तोप  देखने को हैं मिलते
तो कही उनके पहनावें  के वस्त्र मिलते
देख इनसब को मन में  ये विचार आया
क्यों  न किसी  ने इसमें परिवर्तन लाया 

क्यों नही इसमें रेप के  कपड़े रखे जाए
जो समाज को ये असली चेहरा दिखाए
क्यों नही  इसमें वे पत्थर रख दिये जाए
जो हत्या के उद्देश्य से प्रयोग किये जाते

आखिर यह भी तो हमारा इतिहास ही हैं
जो  इस समाज के लिए एक मिशाल  हैं
लोगों को यह बात तो पता  होना चाहिए
कितने कुकर्मी है लोग ये दिखना चाहिए

क्यों न खून से सने कपड़े रखे दिए जाते
आखिर यह भी लोगों के कर्म का फल है
क्यों न उसके अस्थियों को संजोया जाए
उसपे जो बीती है वो कहानी लिखी जाए

देख बंदूक हम अक्सर यह सोचने लगते
आखिर कैसे लड़ते होंगे यह पूछने लगते
फिर जब ये मासूम के कपड़े लोग देखेंगे
तो उसकी उम्रका सवाल तो जरूर पूछेंगे

असली मकसद  संग्रहालय का पूरा होगा
इस पीड़ा  को देख मन आग बबूला होगा
फिर कल किसी  बेटी बहु का न रेप होगा
यही  इस कविता का असली संदेश होगा

अविनाश सिंह
8010017450

76:-निर्भया इंसाफ़।

क्या निर्भया को  मिल गया है इंसाफ
एक बार जरा सोच करके तो देखिये
क्या यही थी उनके गुनाहों की सजा
इनके कुकर्मों को जरा पढ़के देखिये

मरते दम तक था  वकीलों का हाथ
जो करता था झूठे दलीलों पर बात
जिसनें तार-2 किया माँ के जज्बात
कैसे कहूँ की हुआ यहां एक इंसाफ

सात साल का  वक़्त क्यो लग गया
सिर्फ फाँसी की  सजा ही क्यों  हुई
क्यो नही  रेता गया इनके अंगों को
ये सजा होनी चाहिए थी दरिंदो को

सात सालों तक राज किया जिसनें
कोर्ट का वक़्त जाया किया जिसने
अब  जाकर मिली है उन्हें ये फाँसी
जो थे इस देश के  गले की  खाँसी

क्या निर्भया को  सुकून मिला होगा
उसकी आत्मा कोशांति मिला होगा
या उसकी रूह  शांत हो गयी होगी
नही वह न्याय से ही रूठ गयी होगी

वह वकील इस देश पर कलंक था
जो लड़ रहा था केस इन दरिंदों का
चलों इसका भी अंत हार  कर हुआ
वरना बन जाता ये औरों का मसीहा

अविनाश सिंह
8010017450

Wednesday, July 8, 2020

61:-हो फिर हो गया।

लो फिर से हो गया एक और अत्याचार
हो गया फिर से एक बेटी संग नरसंहार
कह रहे सब की बदल रहा है मेरा  देश
आज फिर से हो गया एक बेटी का रेप।

दिल दहल जा रहा यही सोच कर हर बार
थोड़ा सा जलने पर होता कितना दर्द यार
वह तो जल कर बन गयी थी राख समान
फिर कैसे कहूं बार बार मेरा भारत महान।

बेटी तुमपे आज कितना अत्याचार हुआ है
मानवता शब्द आज फिरसे शर्मशार हुआ है
लो अब फिर से कैंडल जलना शुरू हो गया 
और कानून मेरा  बिस्तर ताने सोये हुआ है।

कोठे की तवायफ़ आज उसके लिये रो पड़ी
देख शरीर को उसके फिर चीत्कार उठ पड़ी
तू खेल मेरे जिस्म से तुझे जितना है मन करें
मेरे देश की बहू बेटी पर तु बस रहम कर दें।

अविनाश सिंह
8010017450

60:-मेरा जुर्म।

माँ हाथों में आला नही मैं तो जल कर मरी थी,
घर पर नही मैं तो रोड पर मरी हुई पड़ी थी।

क्या खता थी माँ मेरी, मेरा हिन्दू होना जुर्म था,
लड़की होना,या 26 वर्ष का होना मेरा जुर्म था।

जो मैंने इस कदर से अपनी है जान गवां दी,
इंसानियत के नाम पे उसने हैवानियत दिखा दी।

मुझपे क्या बीती होगी कैसे तुझे बतलाऊ माँ,
अपनी वेदना को तुझे कैसे मैं समझाऊ माँ।

मैं तड़पी भी, रोई भी थी और चिलाई भी थी,
अपने जिंदगी के खातिर गुहार भी लगाई थी।

मेरी बातों का उनपर एक असर न हुआ था माँ,
तेरी लाडली सी बेटी को नोच खाया उन्होंने माँ।

इस पावन धरा पर मेरे संग अत्याचार हो रहे थे,
क्या माँ दुर्गा की आँखे उस वक़्त ही बंद पड़े थे।

मेरे दर्द की आग से आज भी लपटे उठ रही है,
मेरी आत्मा आज भी इन पीड़ा से कराह रही है ।

किस करवट से सोऊ माँ हर तरफ सिर्फ दर्द है,
मेरे शरीर पर ना जाने कितने दरिंदो के स्पर्श है।

चार दरिंदे थे वो कोई बड़ा तो कोई छोटे उम्र के थे
इंसान तो न थे पर वो तो सिर्फ हवश के पुजारी थे।

इन्साफ़ की गुहार अब बता मैं क़िस्से लगाऊ माँ,
जीवित भी नही जो आप बीती सबको सुनाऊ माँ।

मेरी यह वेदना अब तो सुन लो न रे इंसान,
इन हत्यारो को फाँसी दिला दो न हे भगवान।

अपनी प्रियंका के रूह को मुक्ति दिला दो न माँ,
मेरी यह पीड़ित कविता सभी को पढ़ा दो न माँ।

अविनाश सिंह
8010017450

हाल के पोस्ट

235:-कविता

 जब भी सोया तब खोया हूं अब जग के कुछ  पाना है युही रातों को देखे जो सपने जग कर अब पूरा करना है कैसे आये नींद मुझे अबकी ऊंचे जो मेरे सभी सपने...

जरूर पढ़िए।