धरती माता
होती अन्न की दाता
क्यों बेच खाता।
कोरोना युद्ध
परमाणु है फेल
प्रकृति खेल।
सबने कहा
सब कुछ है पास
शांति विनाश।
धन की भूख
तन से मिले सुख
रहना दूर।
मन की शान्ति
खुले आसमान में
न शहर में।
ट्रैन में मौत
सब ओढ़े चादर
है बेखबर।
वर्षा का जल
दे मन को शीतल
जग निर्मल।
दुर्गा पूजते
घर में है पीटते
मर्द बनते ।
बेटी का जन्म
फैल गया सन्नाटा
चिंता सताती।
दिया है सोना
फिर भी जोड़े हाथ
बेटी का बाप।
दहेज भय
पिता को है सताए
उम्र घटाए।
बेटी का दर्द
समझती है अम्मा
वह भी बेटी।
मन मंदिर
होते है स्वच्छ द्वार
भर दो प्यार।
पैरों के छाले
किसे दिखने वाले
करें बहाने।
अविनाश सिंह
8010017450
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