Wednesday, July 8, 2020

41:-महसूस करने लगा हूं।

कुछ अजीब सा महसूस करने लगा हूं तुम्हें पाकर,

अपने हर ग़मों से दूर करने लगा हूं तुम्हें पाकर। 

न शब्द है,न लब्ज है, वो सब कुछ बोलने को,

जो पाकर तुम्हें हर पल महसूस करने लगा हूं।

बस चाहे हैं और राह नहीं कि पाकर तुम्हे खो ना दूं,

जिंदगी के हर लम्हों को मैं तेरे संग बीता सकूं।

तेरे दिल की सादगी को अपनी आंखों में उतार सकूँ,

तुझसे बिछडु ना कभी, हर दिन तुझे अपना बना सकूँ।

बस चाह है और राह नही की जिंदगी के हर मोड़ पे

हर गमो में, हर सुखो में तेरे हाथों का स्पर्श पा सकूं,।

बस चाह है और राह नहीं कि तेरी छोटी-छोटी

नादानियों को अपनी जिंदगी के खुशी बना सकूं।

हर लम्हा तेरे संग बीते, हर पल को मैं यादगार बना सकूं,

बस चाह है और राह नही की तेरी आंखों की मोहब्बत 

का तकाजा अपनी गिरि नजरों से लगा सकूं।

तुझे अपना बना के बस तुझ पर ही मोहब्बत लुटा सकूँ,

बस चाह है और राह नही की गीत में जो अकेले में गाता हूं 

वो तेरे संग गा सकूँ। तेरे कंधे पर सर रख आशु टपका सकूँ,

तुझसे बेइंतहा मोहब्बत करके भी तेरी मोहब्बत पा सकूँ 

बस चाह है और राह नही।


अविनाश सिंह

8010017450

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