Thursday, July 9, 2020

88:-बदल गया हैं।

बहुत कुछ अब बदल गया है
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झुक कर आशीर्वाद लेना अब कहाँ हैं 
ऊपर से पैर छूने का प्रचलन हो गया हैं
माँ बाप के चरणों में जो सुबह होती थी
वह तो अब मोबाइल से होने लगी है।

बहुत कुछ अब बदल गया है
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परिवार का अब लुक बदल गया हैं
अलग बैठने का सुख अब चल गया हैं
हम खुले हवा में जो नींद लिया करते थे
वह अब ए.सी की हवा में रुख कर गया है।

बहुत कुछ अब बदल गया है
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पूजा करने का अस्तित्व अब अलग हैं
यूटब से आरती पढ़ने का मजा अलग हैं
अब तो मंदिर के साथ सिर्फ फ़ोटो आती हैं
भगवान के सामने झुकने का तरीका गज़ब हैं


बहुत कुछ अब बदल गया है
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गाँव बदल गया शहर बदल गया
बाग फैक्ट्रीयों में तब्दील हो गया
जिस मैदान में हम खोखो खेलते थे
वो अब कार पार्किंग में तब्दील हो गया

बहुत कुछ अब बदल गया है
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शिक्षक छात्र का रिश्ता बदल गया
अब तो मन से डर ही खत्म हो गया
हम तब कंचे ले जाने से भी डरते थे
अब मोबाइल लें जाना तो आम हो गया

बहुत कुछ अब बदल गया है
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गर्मी में जहाँ ट्यूबवेल पर नहाते थे
तो सर्दी में वही हम पुवाल जलाते थे
अब तो रूम हीटर और ए.सी आ गया
वह सर्दी और गर्मी अब स्वर्ग सा हो गया

बहुत कुछ अब बदल गया है
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जो दिल में रहते थे वो मोबाइल में रहने लगे
जो हमें प्रिय थे उनका तो ठिकाना बदल गया
एक खत एक संदेश के आगे अब ग्रुप चल गया 
हमें तो सच में लगता हैं अब जमाना बदल गया

बहुत कुछ अब बदल गया है
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जो प्यार ग्रीटिंग कार्ड में होती थी
खोलते ही प्यार भरी बाते होती थी
अब तो ऑनलाइन का जमाना आ गया
सच में मेरा बचपन बहुत पीछे चल गया

बहुत कुछ अब बदल गया हैं
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खोजों इस जन्मदिन तुम्हे किसी ने कुछ लिख कर दिया गया
अच्छा,बस ऑनलाइन संदेश और कॉपी मैसेज का संदेश किया
अब बचपन की डायरी,कार्ड,पन्ने पलट कर के देखों जरा तुम
मुस्कुराहट प्रेम आँसू  सब एक साथ चहरे पर देखो आया
क्या।

बहुत कुछ अब बदल गया है
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मंदिर की आरती से मस्जिद के अजान तक
सुबह उठने से लेकर शाम के विश्राम तक
दीवाली के सजावट से होली के गुलाल तक
दीया से एलईडी तक सब कुछ बदल गया हैं


बहुत कुछ अब बदल गया हैं
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नज़रिया बदल गया सोच बदल गया 
लोग बदल गए तो समाज बदल गया
बस कुछ नही बदला हौ अगर तो वो
मेरी माँ का निश्छल प्रेम अटल बन गया
प्यार बदल गयाहुलिया बदल गया 
कुछ नही बदला अगर 
माँ का प्रेम अटल रह गया

बहुत कुछ अब बदल गया हैं
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कवि सम्मेलन का रूप बदल गया
ग़ज़ल का तो स्वरूप बदल गया है
अब तो हर कोई कवि की उपाधि ले रहा
अब तो लिखने का ही रूप बदल गया हैं

अविनाश सिंह
8010017450

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