Wednesday, July 8, 2020

44:-मेरा बचपन।

लगता है पिछे बहुत कुछ छूट गया है,
वो बचपन अब हमसे क्यो रूठ गया है।

उस वक़्त ख़ुशी के ठिकाने न होते थे,
मेले में जाने के अनेक बहाने होते थे।

पापा संग जाऊ या भैया संग मेला जाऊ,
सोच-2 के मैं खुद असमंजस में पड़ जाऊ।

हृदय फुला न समाता था मेला जाने की चाह से
सुबह से ही तैयारी रहती मेले में जाने की बात से।

पापा के उँगली पकड़ हम चल देते थे मेला करने,
20 रुपया जेब में लेके खुशियों का संसार बटोरने।

गुबारों के दुकानों पे हम यू दुखी होके अड़ जाते थे,
पापा-पापा कह के हम 2 3 गुबारे ख़रीदवाते थे।

घड़ी के दुकान से घड़ी लेना तो चश्मा पहन खुद को
सलमान खान समझना सच मे आज बहुत याद दिलाता है।

चाट फुल्की समोशे के ढेले पे हम खूब खाया करते थे,
फिर जलेबी भी हम झट से गप कर जाया करते थे।

बड़े झूले पे बैठने की हम जिद्द पापा से किया करते थे,
उनकी डाट सुन के हम थोड़ा दुखी हो जाया करते थे।

फिर हमें टिक टिक वाली ट्रैन में बैठा दिया करते थे,
खुद बाहर खड़े होके हमे टाटा-टाटा किया करते थे।

हमारे दोनो हाथों में खिलौनों का भंडार हुआ करता था,
पापा के उंगली पकड़ने का भी न जगह हुआ करता था।

जो खुशी मिलती थी उस वक़्त में आज उसे कैसे बताऊ,
दुःख होता है कि आज उस बचपन को कैसे मैं भुलाऊँ।

लगता है सच मे आज बहुत कुछ बदल गया है,
वो खुशी के पल न जाने कही वीरान हो गया है।

जेब में 4000 होके भी कब कुछ पसंद नही आता है,
न जाने हम बदल गए या वो गुबारे का रंग बदल गया है।

हमारी सोच बदल गयी है या हम बदल गए है,
अब हम खुद मेले में एक अजनबी हो गए है।

लगता है पिछे बहुत कुछ छूट गया है,
वो बचपन अब हमसे क्यो रूठ गया है।

अविनाश सिंह
8010017450

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