जिंदगी के कुछ साल मैं अकेले जीना चाहता हूँ,
इन आँसुओ को कुछ और वक़्त मैं देना चाहता हूं।
बन्द कमरे के अंधेरे में मैं ख़ुद को देखना चाहता हूं,
उन यादो को मैं कुछ और वक़्त देना चाहता हूं।
क्या पाया क्या खोया है मैंने इस दौड़ में,
मैं खुली आँखों से देखना चाहता हूं।
जो छोड़ गया साथ बीच राह में,
उसकी वजह जानने को चाहता हूँ।
मिल जाये वो इस वक़्त तो
उसे समझने का वक़्त देना चाहता हूँ।
थक गया हूं मैं बहुत कुछ पाने की आस में
अब मैं थोड़ा ठहराना चाहता हूँ,
अब अपनी आंखों को आराम नही,
बल्कि गहरी नींद देना चाहता हूं।
सबसे दूर मैं बस खुद में जीना चाहता हूं,
जिंदगी के कुछ पल मैं अकेले जीना चाहता हूं।
अविनाश सिंह
8010017450
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