हाय गरीबी का आलम ये सब मैं क्या देख रहा,
बेटी के ब्याह खातिर बाप घर को है बेच रहा।
कहाँ नही है गरीबी कोई तो एक जगह बताओ,
जहाँ दुखे न दिल मेरा वहां मुझे तुम ले जाओ।
मंदिर में है भगवान तो बाहर गरीबो का है डेरा,
माँगते हुए भीख हुआ सुबह से रात का अंधेरा।
इस कदर गरीबी छायी हुआ देश का हाल बुरा,
कचड़े में रोटी तलाशती नवभारत का है सवेरा।
रोते बिलखते मासूम,दवा के अभाव में है मर रहे,
सियासत के नेता उसपे भी अपनी रोटी सेक रहे।
द्रवित हो उठता है मन देख भारत के भविष्य को,
किताबों की जगह कटोरे लिए देश के कनिष्क को।
कब बदलेगा समाज कब बदलेंगी गरीबी की सूरत,
थोड़ा प्रयास करो शायद बदलेगी इस देश की मूरत।
अविनाश सिंह
8010017450
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