कौन कहता है बेटी दुर्गा का रूप होती है,
माँ की प्यारी और पिता की दुलारी होती है।
जो दुर्गा हुई तो इन नामर्दो के सामने आँशु क्यो बहाती है,
ससुराल के ताने-बाने सुन सब कुछ सहन क्यो कर जाती है।
लिया जन्म जो लक्ष्मीबाई का फिर पीछे हट ये जाती है,
पति के सारे हुकम को ये बर्दाश क्यो कर जाती है।
घर की लक्ष्मी होती है बस ऐसा किताबो में लिखा होता है,
ससुराल में नौकरानी बन जाती है ऐसा हाकितत में होता है।
जो पिता की दुलारी है फिर दहजे का सौदा क्यो होता है,
लेके जन्म माँ के कोख से फिर ये घर पराया क्यो होता है।
बेटे से तो कम नहीं फिर भी ये अत्याचार संग क्यो होते है,
कभी आग तो कभी जहर के निवाले ही नसीब क्यो होते है।
धरती पे लेने से पहले ही इन्हें कोख़ में मार दिया जाता है,
जन्म से पूर्व ही श्मसानघाट का रास्ता दिखा दिया जाता है।
जो इतनी प्यारी थी तो समान दर्ज क्यो नही है मिलता,
बेटों की तरह उन्हें भी वो हक क्यो नही है मिलता।
अविनाश सिंह
8010017450
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