बड़े हों इसलिए ही आपका सम्मान करती हूँ,
तभी तो मैं आपका कभी न अपमान करती हूं।
अग्नि को साक्षी मान मैंने आपको पति माना है,
माँ-बाबूजी का घर छोड़ आपको अपनाया है।
आप मेरे रखवाले है, मेरे लिए आप ही निवाले है,
मानती हूं मैं बात आपकी,करती हूं हर काम आपकी।
सुबह से लेके शाम तक मैं सारे काम निपटाती हूँ,
खुद भूखी होके मैं सबको पहले खाना खिलाती हूं,
कभी सास की सुनाती हूँ तो कभी ससुर की सुनती हूँ,
मैं लड़की हूँ क्या इसलिए मैं घुट-घुट के मरती हूँ।
रोटी बनाना,खाना खिलाना क्या सिर्फ यही मेरा संसार है?
अपनी इच्छाओ की हक़दार नही, सच कहने पे गुनेगार बनी।
स्वयं परिंदो समान घुमते हो, मेरे पैरों में बेड़ियो को जकड़ते हो,
पति हो क्या इसलिए, हर पल मुझमें ही कमियो को ढूंढते हो।
मेरा यही गुनाह है,आप पति हों इसलिए आप महान है,
मैं पराई बेटी हूँ ना इसलिए मुझपे ये सारे अत्याचार है।
अविनाश सिंह
8010017450
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