Wednesday, July 8, 2020

60:-मेरा जुर्म।

माँ हाथों में आला नही मैं तो जल कर मरी थी,
घर पर नही मैं तो रोड पर मरी हुई पड़ी थी।

क्या खता थी माँ मेरी, मेरा हिन्दू होना जुर्म था,
लड़की होना,या 26 वर्ष का होना मेरा जुर्म था।

जो मैंने इस कदर से अपनी है जान गवां दी,
इंसानियत के नाम पे उसने हैवानियत दिखा दी।

मुझपे क्या बीती होगी कैसे तुझे बतलाऊ माँ,
अपनी वेदना को तुझे कैसे मैं समझाऊ माँ।

मैं तड़पी भी, रोई भी थी और चिलाई भी थी,
अपने जिंदगी के खातिर गुहार भी लगाई थी।

मेरी बातों का उनपर एक असर न हुआ था माँ,
तेरी लाडली सी बेटी को नोच खाया उन्होंने माँ।

इस पावन धरा पर मेरे संग अत्याचार हो रहे थे,
क्या माँ दुर्गा की आँखे उस वक़्त ही बंद पड़े थे।

मेरे दर्द की आग से आज भी लपटे उठ रही है,
मेरी आत्मा आज भी इन पीड़ा से कराह रही है ।

किस करवट से सोऊ माँ हर तरफ सिर्फ दर्द है,
मेरे शरीर पर ना जाने कितने दरिंदो के स्पर्श है।

चार दरिंदे थे वो कोई बड़ा तो कोई छोटे उम्र के थे
इंसान तो न थे पर वो तो सिर्फ हवश के पुजारी थे।

इन्साफ़ की गुहार अब बता मैं क़िस्से लगाऊ माँ,
जीवित भी नही जो आप बीती सबको सुनाऊ माँ।

मेरी यह वेदना अब तो सुन लो न रे इंसान,
इन हत्यारो को फाँसी दिला दो न हे भगवान।

अपनी प्रियंका के रूह को मुक्ति दिला दो न माँ,
मेरी यह पीड़ित कविता सभी को पढ़ा दो न माँ।

अविनाश सिंह
8010017450

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