माना तुमसे मेरी बात नही होती
पर ऐसा नही तुम याद नही होती
मेरे हर सवाल में तुम याद रहती
मेरे हर जवाब में तुम साथ रहती
मैं उठता हूं तुम्हे ही याद करता हूं
घर पर भी तुम्हें फरियाद करता हूं
मेरे हर जोड़ गुणा में तुम रहती हो
हर कैलकुलेशन में तुम बस्ती हो
मेरे किताब पर तुम्हारा नाम होता
हल में कुछ न कुछ गलती होता
फिर भी मनही मन खुश हो लेता हूं
तुम्हें याद करके मैं भी हँस लेता हूं
मजबूर हूं इस लिए व्यक्त नही देता
घर की सारी जिम्मेदारी मैं लेता हूं
जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा
दोनो का साथ हमेशा काहो जाएगा
खाने के समान देख मैं याद करता हूं
तुम्हें चॉक्लेट देने को जिद मैं करता हूं
मेरे जुबा से तुम्हारा नाम निकलता हैं
मजबूरी के आगे दिल युही संभलता है।
अविनाश सिंह
8010017450
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