Tuesday, July 7, 2020

9:-अशिफ़ा की पीड़ा

माँ हाथो में कलम नही मैं तो खून से सनी थी,
घर पर नही मैं तो जंगल मे मरी हुई पड़ी थी।

क्या खता थी माँ मेरी, मेरा मुस्लिम होना जुर्म था,
या मेरा लड़की होना या 8 साल का होना जुर्म था।

जो मैंने अपनी जान गवां दी,
इंसानियत के नाम पे उसने सारी हैवानियत दिखा दी.

मुझपे क्या बीती होगी कैसे तुझे बतलाऊ माँ,
अपनी वेदना को तुझे कैसे मैं समझाऊ माँ।

मैं तड़पी भी थी और चिलाई भी थी,
जिंदगी के लिए उनसे गुहार भी लगाई थी।

मेरी बातों का उनपे एक असर न हुआ था माँ,
तेरी मासूम सी बेटी को नोच खाया उन्होंने माँ।

इस देवी मंदिर में मेरे संग अत्याचार हो रहे थे,
क्या दुर्गा माँ की आँख उस वक़्त ही बंद हो गए थे।

मेरे दर्द की पीड़ा आज तीन महीने बाद उठी है,
मेरी आत्मा आज भी दर्द से कराह रही है माँ।

किस करवट से सोऊ माँ हर तरफ सिर्फ दर्द है,
मेरे शरीर पे ना जाने कितने दरिंदो के स्पर्श है।

कोई मंदिर के पुजारी थे तो कोई वर्दी के धारी थे,
इंसान तो न थे पर वो तो सिर्फ हवश के पुजारी थे।

इन्साफ़ की गुहार अब मैं क़िस्से लगाऊ माँ,
मैं जीवित भी नही जो अपनी आप बीती सुनाऊ माँ।

मेरी ये वेदना सुन लो न इंसान,
इन हत्यारो को फाँसी दिला दो न भगवान।

अपनी आसिफा को मुक्ति दिला दो न माँ,
मेरी ये कविता सभी को पढ़ा दो न माँ

अविनाश सिंह
8010017450

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