अमीरों में जन्म लेकर गरीबी तुमने कहां देखा है
उजड़ते हुए झोपड़ियों को मैंने हर वक़्त देखा है।
वस्त्र नही गरीबों को,शस्त्र की सुरक्षा अमीरों को
तपती धूप में भी इन्हें अपना खून बेचते देखा है।
बस पेट भरने के खातिर रात्रि से सुबह किया है
पैसो की भूख में अमीरों को अंधा होते देखा है।
तुम्हे बोटी की चाह होती इन्हें रोटी की चाह होती
रोड़ पर सोते हुए इन्हें मैंने रातों को मैंने देखा है।
कोई हाथ थामे इनका साथ दे ऐसा अब कोई नही
इनके नाम पे पैसे ऐंठते हजारों नेताओं को देखा है।
सबका साथ मिले इनका जीवन खिले यही आश है
इस सपने को साकार होते मैंने यह सपना देखा है।
अविनाश सिंह
8010017450
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