कर दिया है कलंकित तूने अली के गढ़ की बेटी को,
लगा दिया तूने काला धब्बा भारत माँ के उस बेटी को।
काट खाया तूने उसे जैसे कोई हो मांस की बोटी वो,
दरिंदगी की हद पार कर तार कर दिया इंसानियत को।
मासूम सी थी वो सबकी दुलारी और घर की प्यारी थी,
छोटी सी उसकी दुनिया थी माँ बाप की वो प्यारी थीं।
उसपे इतना अत्याचार हुआ कैसे उसने सहा होगा,
देख लाडली को कपड़े में माँ का क्या हाल हुआ होगा।
चिल्लाते चिल्लाते खुद को संभाल नही पा रही थी,
ट्विंकल ट्विंकल बोल के वो बेहोश हो जा रही थी।
फूलों समान जिसे पाला था,आज कुत्ते उसे नोच रहे थे,
देख उसके पार्थिव शरीर को,उसमे न कोई भी अंग बचे थे।
इतनी दरिंदगी करते वो क्या थोड़ा भी वो सहम पाया नही,
ऐसा अत्याचार करते क्या उसका हाथ थोड़ा कपकपया नही।
कपड़े उसके छोटे थे इस उम्र में कैसे उसे साड़ी पहनाती,
तीन साल की लड़की देख उसकी कैसे हवस है जाग जाती।
स्वयं अत्याचार करके उसने निर्दोश को सूली पे चढ़ा दिया,
खुद शान से वो घूम रहा था प्रशासन भी उसे ही बचा लिया।
जब तक कठोर सजा न होगा, ये देश पर एक दाग ही होगा,
मोदीजी का बेटी बचाओ का सपना कभी भी न साकार होगा।
देदो फाँसी की सजा उसे अब कुछ भी नही बर्दाश्त होगा,
नही तो बहेगा लहू हर दरिंदो का अब यही संविधान होगा।
तोड़ पुराने कानून को उसमे कुछ तो सुधार करो,
देके फ़ैसला सजा मौत का दरिंदो पे अब वॉर करो।
हत्यारों को फाँसी हो, देशहित में ये सजा भी कुछ कम होगा
कुछ ऐसा नियम बने की रेप का कभी भी न नामो निशान होगा।
अविनाश सिंह
8010017450
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