डर लगता था माँ बेटी पैदा होने से,
दूर हो गयी माँ तेरे आँचल के सपनो से।
मेरी जिंदगी एक तरह की खेल हो गई,
इन दरिंदों से मैं हमेशा के लिए फेल हो गयी।
क्या उम्र थी माँ मेरी क्या कसूर थे मेरे,
जो मेरे संग ऐसा नरसंहार हुआ,
न जाने कितना मेरे पे अत्याचार हुआ।
क्या बिगाड़ा था मैंने अल्लाह का
क्या चुराया था मैंने हिन्दू का,
आज दोनो ने ही मेरी जान ले ली।
मैं चीखी भी थी और चिलाई भी थी
माँ-माँ कह के तुझे पुकारी भी थी
इन दरिंदो के आगे मेरी चीखे ना सुनाई दी,
पावन मंदिर में मैं बदहवास सी पड़ी थी।
4 दिनों से यातनाओ को सह रही थी माँ,
फिर भी मैंने हिम्मत न हारी थी माँ।
इतना होने पे भी इन्हें जरा सा दया न आया,
पत्थरो से कुचल कर मेरे शरीर को जंगलो मे दफनाया।
इंसानियत के हर वसूलों को खो दिया था इन अफसरों ने,
हैवानियत के हर कदमो को पार कर दिया इन दरिंदो ने।
अब माँ जीने की इच्छा खत्म हो गयी,
इसी लिए तेरी बेटी तुझसे कोसो दूर हो गई।
अविनाश सिंह
8010017450
No comments:
Post a Comment