Thursday, July 9, 2020

115:-पिता के लिए पंक्ति।

पुराने कपड़े में उन्हें अक्सर देखा
नही किसी चीज की चाहत देखा
जब भी मैं  उनके दिल में झांका
बच्चों के भविष्य की चिंता देखा।

कभी नही कुछ  हमें कमी किया
खुद से ज्यादा हमें खुशियां दिया
अपने ऊपर दुख  को झेल लिया
मेरी झोली खुशियों से भर दिया।

हर डाँट में मुझे आशीर्वाद मिला
हर प्यार से जीवन में  राह मिला
बड़े ही नसीब वाले होते वो लोग
जिन्हें पिता जी का  साथ मिला।

उंगली पकड़ के चलना सीखा था
हाथ पकड़ के आगे बढ़ना सीखा
अब तो उनकी बातों को याद कर
मैं  जिंदगी में सफल होना सीखा।

वह इंसान नही है वह भगवान है
पितृ रूप धरती पे  विराजमान है
ये तो देखने मात्र का  नजरिया है
मेरे लिए हर देवों से वो महान है।

गिरा तो उंगली पकड़  के चलाया
ठोकर लगा तब  मुझे है समझाया
यह ऊपर  वाले का रहम है मुझपे
मैं जो भी है उन्होंने ही तो दिलाया

अविनाश सिंह।
8010017450

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