Tuesday, July 7, 2020

11:-इंसान बनना चाहता।

मैं इश्क़ में भी इंसान बनना चाहता हूं,
करके कुछ अच्छे काम मैं महान बनाना चाहता हूं।

हा मैं कुछ नेक काम करना चाहता हूं,
औरो को नही मैं खुद को बदलना चाहता हूं।

ना धन की चाहत है न दौलत की चाहत है,
पाके इन्हें मैं गरीबो के बस नाम करना चाहता हूं।

माँ के बुढ़ापे का मैं सहारा बनाना चाहता हूं,
तो पिता के जीवन का सहारा बनाना चाहता हूं।

ना नौकरी की आश है न महल की चाह है,
खुद को जल के भी औरों के लिए छाव बनाना चाहता हूं।

मैं बिन बेटे के माँ का बेटा बनाना चाहता हूं,
उनके चहरे पे हस्सी का एक हिस्सा बनना चाहता हूं।

समाज मे फ़ैली कुरीतियों को दूर करना चाहता हूं,
तो अपनी कविता के माध्यम से यही संदेश देना चाहता हूं।

अविनाश सिंह
8010017450

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