भरी दोपहरी में छांव खोज लेता हूं
रेगिस्तान में भी नाव खोज लेता हूं
क्या करूं मैं इस समाज का जनाब
देख सबकुछ मैं नकाबओढ़ लेता हूं
कोशिश की मैंने बदलने को बहुत
बदलते-2 मैं खुद को बदल लेता हूं
गिराया है लोगों ने अक्सर मुझे नीचे
गिर के नीचे मैं आसमां देख लेता हूं
चला था मैं अकेले पहाड़ को तोड़ने
शाम होते ही मैं घर को लौट लेता हूं
खोजता हूं मिट्टी के आशियाने को मैं
मायूस होकर महलों में लौट लेता हूं
कब तक ऐसे फिरता रहेगा अविनाश
छोड़ सब मैं किताबो से मिल लेता हूं।
अविनाश सिंह
8010017450
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