Tuesday, July 7, 2020

6-कविता-पत्थरों की जुबानी

पत्थरों को देख मैंने बहुत कुछ सीखा हैंं,
दुसरो को ठोकर दे खुद अड़िग रहते देखा है,
हमेशा से शांत हमेशा से बेजान रहा है वो,
लोगो को सिर्फ उसकी तुलना ही करते देखा है।

कभी राम तो रहीम का मूर्तियों के काम आता हूं,
न जाने कितने राहो का मैं कोमल पथ बन जाता हूं,
कभी पानी तो कभी हथोड़ो के प्रहार को भी सहा हूं,
कभी दुर्गा तो कभी शंकर का रूप भी धारण किया हूं।

जितना घिसा, जितना टूटा हूं उतना ही चमका हूं,
कभी राम।कभी घनशयाम का रूप बन के आया हूं,
मैं बेजुबान होके भी हर धर्म का आधार बन जाता हूं,
ये इंसान एक दूसरे का हैवान फिर क्यो बन जाता है।

मैं हर धर्मो में समान  हूं चाहे हिन्दू हूं या मुसलमान हूं,
सबमे मेरा ही अस्तित्व है मेरा एक ही रूप विराजमान है,
ये तो तुम्हारी और हमारी सोच ने हमे अलग कर डाला है,
वरना पत्थरो का ना तो कोई धर्म ना ही कोई निवाला है।

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