चिलचिलाती धूप में मैंने एक इं
सिर पर पगड़ी और उसकी चाल को दे
चंद पैसे ख़ातिर रोजाना सवेरे निकलता है,
कभी बरसात कभी गर्मी को भी झेलता है।
सबकी गालियोंं का शिकार वो होता
पर किसी को पलट के जवाब नही दे
बिना भेद-भाव के सबको सैर कराता हैं,
सबको उसके मंजिल तक पहुंचाता है।
फिर भी लोग उसका सम्मान नही
5 पैसे बचा उसका ही अपमान करते है।
दो पल की रोटी की बस उसे चाह हो
ना बर्गर और ना चौमिन की आस होती है।
लोग पट्रोल से कार चलाते है,
वो खून से रिक्शा चलाता है।
हम पांच रपये भी कम कराते है,
और 3000 की जीन्स खरीद लाते है।
अपने बरसात में वो भीगता है,
फिर भी तुझे ढक के ले जाता है।
पर इंसानो को ये बात कहा समझ
उमीद है मेरा लिखा हुआ ये एक
तेरे सोच में कुछ ना कुछ परिवर्तन तो होगा।
अविनाश सिंह
8010017450
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