Tuesday, July 7, 2020

3:कविता:-मैं खोने लगा।

कुछ पाने की  चाह में सब खोने लगा
बिन भिगोए हाथ, मैं हाथ  धोने लगा

चला था मैं सब को एक साथ जगाने
सब को उठा के मैं खुद ही सोने लगा

अब उसको ही पाने की तो चाहत थी
सबको पाकर बस उसे ही खोने लगा

हँसाने की सौग़ात देने आया लोगों में
औरों को हँसा के मैं खुद में रोने लगा

लोग लगे थे नफरत के पेड़ लगाने में
नफरत में मैं प्रेम का  बीज बोने लगा

अब खुद से  ही  डरने लगा अविनाश
जोसब होते हुए भी अकेला होने लगा

*अविनाश सिंह*
*8010017450*

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