मैं इश्क़ के समुंदर में यू हाथ धोने चला था,
अंत तो नही बस गहराई को नापने चला था।
मिले कही शूल तो कही पत्थरों के ठोकर,
बिन भिगाये पैर मैं समुन्द्र को पार करने चला था।
नादान था मैं इन लहरों की तेज धाराओं से,
बिन सोचे समझे मैं कदम आगे को बढ़ाने चला था।
ना सोंचा न समझा ये तेज हवाओं के रुख को,
बिन सोचें मैं इश्क़ के समुन्द्र में डूबने को चला था।
सुना था धाराएं कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकूल होती,
पर इश्क़ में मेरे ये धाराएं हर वक़्त प्रतिकूल को चला था।
अविनाश सिंह
8010017450
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